ख़ामोशी

चलती हुई नदी, बंद किताबों सी थी
उसकी ख़ामोशी कई सैलाबों सी थी।
मैंने रखा जिसे उम्र भर पलकों पे सजा कर
वो चीज़ मखमली ख्यालों, मदमस्त ख़्वाबों सी थी

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तेरे जाने के बाद

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बड़े दिनों से मन में इक कसक सी थी

अरसे बाद दिल खोल के रोया तेरे जाने के बाद

कभी फुरसत मिली तो सोचेंगे

बचा ही क्या था जो खोया तेरे जाने के बाद

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हुनर

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जुहराह-ए-रूह-ओ-नज़र अभी बाकी है
सब्ज़ा-ए-दिल-ए-शजर अभी बाकी है!
अभी भी है चर्चा हमारा कूचा-ए-रक़ीब में
लगता है इस कलम में हुनर अभी बाकी है!!

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जुहराह-ए-रूह-ओ-नज़र – Brightness of soul and eyes
सब्ज़ा-ए-दिल-ए-शजर – Greenery in tree of heart
चर्चा – Discussion
कूचा-ए-रक़ीब – One’s rival’s lane
हुनर – Skill/Talent

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