सोच रही हुँ कुछ लिख दू ऐसा

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सोच रही हुँ कुछ लिख दू ऐसा
कि बयां दिल का हाल हो जाये
तेरे तस्वुर में देखा हर ख्वाब
सच कि मिसाल हो जाये

लफ्ज़ो के ज़रिये आज इतने करीब आ जाये
के सब फांसले फ़िज़ूल हो जाये
कभी जो तेरे तस्सवुर में मैंने मांगी थी
वो सब ख्वाहिशे आज काबुल हो जाये

ख़ुदा सुन ले मेरी इतनी सी इल्तजा
बस इतनी सी मुराद पूरी हो जाये
तेरे पहलु में रात मेरी गुज़रे
तेरे आँगन में सुबह आबाद हो जाये

तू दूर भी हो तो पास ही हो
ऐसे हालात हो जाये
खुद को छू कर तुझे महसूस करे
ऐसे जज़्बात हो जाए

हो जाए आज कुछ ऐसा सितम
के दिल के सब ज़ख़्म शाहदाब हो जाये
बेसवाल हो जाये ज़ख़्म देने वाले
और ज़ख़्म कि दवा लाजवाब हो जाये

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3 thoughts on “सोच रही हुँ कुछ लिख दू ऐसा

    • hahaa… sahi kaha aapne Prateek… in lafzo ke zariye se hum kehte to boht kuch hai par musibat ye hai ki jise samjhana hota h wo shayar nahi hota isliye samjh bhi nahi pata..

      shukriya zarra nawazi k liye!!!

  1. Swati hi ऐसे ही लिखते रहा करो दिल को बहूत सकुन मिलता है ईरशाद

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