झूठ का मुलाजिम

 

सबने कहा बेटा, डॉक्टर या इंजिनियर बनना
हमने सुना कुछ और, समझा और, जायज़ था शायर बनना

चलते हुए जाने क्या क्या याद आने लगा
रास ना आया मुझे फिर उस राह का मुसाफिर बनना

खुदी को ख़ाक करो, तो ये मंजिल पाओ
के बड़ा मुश्किल है इस ज़हां में आशिक बनना

मिलता नहीं खुदा काबा में, ना शिवाले में
उसे पाने के लिए पहली शर्त है काफ़िर बनना

वो पढ़ाते रहे, सिखाते रहे हमे उसूल दुनिया के
हम ही नासमझ थे, ना आया ता-उम्र सियासी बनना

सब्र का बाँध टूट गया तो खोल ली सच की दूकान
नहीं मंज़ूर था मुझे झूठ का मुलाजिम बनना

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6 thoughts on “झूठ का मुलाजिम

  1. bestest…….
    behteen…i cant express in words swatiji really this is a perfect ghazal with well placed organised and meaning full lines…
    difficult to choose but last line is killer one…
    .
    .सब्र का बाँध टूट गया तो खोल ली सच की दूकान
    नहीं मंज़ूर था मुझे झूठ का मुलाजिम बनना…

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