नए फूल भी खिलेंगे , बेशक नयी बहार भी आएगी

नए फूल भी खिलेंगे , बेशक नयी बहार भी आएगी
पर तुमने ये कैसे सोच लिया के ये पगली सब कुछ भूल जाएगी…

डोली तो सजेगी पर मेरे अरमान नहीं
हाथो में मेहँदी का क्या जब उसमे तेरा नाम नहीं
उस रौशनी में अपनी आत्मा को जलाएगी
तुमने ये कैसे सोच लिया के ये पगली सब कुछ भूल जाएगी…

पलकों के सपने तो कब के सूख गए
वो किये थे जो तुमने वो वादे टूट गए
दिल में फिर भी इक कसक उठेगी जब फ़ोन की घंटी मेंरा ध्यान बटायेगी
तुमने ये कैसे सोच लिया के ये पगली सब कुछ भूल जाएगी…

Inspired by a post नये फूल खिलेगे,नयी बहार आयेगी by Dr. Sunil Arya on his wonderful blog.

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12 thoughts on “नए फूल भी खिलेंगे , बेशक नयी बहार भी आएगी

  1. excellent swatiji….
    kavita ke dusra panne se apne bakhubi rubru kra diya..
    muskil sabhi k liye hein aur uska ehsaas b krna kathin hein ki us par kya beet rhi hogi,,,,
    u have terrific writer in you.
    gr8 poetic skill..extempore ..

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