शिकायते

jk

 

 

 

 

 

बन कर तमाशबीन देखते रहे ज़माने के रिवायते
कर सके न कभी दूर उसके दिल की शिकायते

चलते रहे बे-जान राहों पर युहीं तन्हा
मिलती रही हर रोज़ दूर रहने की हिदायते

हम अब भी करते है याद उस सितमगर की अदाओं को
वो आना देर रात ख़्वाबों में , वो इत्तिहाद की इनायतें

करता था गज़ब जब मुस्कुरा के शिकवा करता था
कहना अब गिला भी ना करू मैं , वो बा-दस्तूर शिकायते

हम करते है चाहत तो लोग ऊँगली उठाते है
वही लोग जो सुनते है मज़े से इश्क की हिकायते

इत्तिहाद : meeting

हिकायते  : stories

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11 thoughts on “शिकायते

  1. kya gazab ka likha hein…behtareen.
    really these lines steal the show..
    चलते रहे बे-जान राहों पर युहीं तन्हा
    मिलती रही हर रोज़ दूर रहने की हिदायते
    kitna sach kaha hein wah wah…

  2. बहुत सुन्दर ….चलते रहे बे-जान राहों पर युहीं तन्हा
    मिलती रही हर रोज़ दूर रहने की हिदाय …..लिखते रहिये

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