ग़ुरबत

ग़ुरबत हो घर में तो अपने भी बेगाने है
जो हमने घर बनाये थे, वो अब उनको ठिकाने है
हमने रखे थे गिरवी जो, वो सपने बिक गये है सब
बचे कुछ लफ्ज़ बाकि है जो अपने हमसफ़र पुराने है
करते है चाहत गरीब भी, मगर मोहोब्बत से डरते है
नहीं चलते उन रास्तों पे जो उसके कूचे से मिलते है
कोई मुंसिफ हो बे-पर्दा कुछ देर की खातिर
ये अब अरमान है पिछले, ये अब भूले अफ़साने है
ये दुनिया उसको चाहती है जो उगता अफताब होता है
जो उजड़ गया हो उस मकान में सब बर्बाद होता है
गरीब की अक्ल का इस दुनिया में कोई मोल नही होता
जिनकी जेब में सुनहरे सिक्के रखे हो, उनके नासमझ भी सियाने है
कभी जब कोई माँ मजबूर हो कर बच्चे  को भूखा सुलाती है
उसी पल उसके तो रूह तक भूख मर जाती है
वो कहती है बच्चों से के बेटा सो जाओ तुम
के आज आने वाली सपनो में मिठाई की दुकाने है
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