ऐतबार…!!

aitbaar

 

 

 

 

 

 

ये तेरी बेरुखी बर्दाश्त मैं क्यूँ करूँ
हिज्र में तेरे रोउ क्यों मै फ़रियाद क्यूँ करूँ
जब मैं करती रही इंतज़ार, तब तू ना आया
अब तेरे आ जाने की अफवाह पे मैं ऐतबार क्यूँ करूँ

चर्चा तो ये भी है के तुम लौट रहे हो उस शहर में वापिस
जिसकी गलियों में चलते हुए मेरा हाथ थामां था
उन बातो का , उन लोगो का कर भी लू मैं भरोसा
पर तेरी बेरुखी को नज़र अंदाज़ क्यूँ करूँ

ना तेरे मेरे बिच अब कोई करार है
ना किसी तरह इत्तिफाक तुझे मुझसे
मैं किस हक से तेरे रहो में पलकें बिछाऊ
तेरी आरजू , तेरा इश्तियाक क्यूँ करूँ

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7 thoughts on “ऐतबार…!!

  1. beautifully express ur feeling…ur love….ur pain
    some people have capability to express their feeling
    but very few people can express so wonderfully way like u did

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