और क्या नाम दूँ

जो चल रही है बे-सबब, बे-वजह दिल में
उस उलझन को क्या नाम दूँ
दिल के कोने में जो घर कर के बैठी है
उस कशमकश को क्या नाम दूँ

वो कहता कुछ भी नहीं
और सब कह भी जाता है
क्या कह के बुलाऊ उस अंदाज़-ऐ-बयाँ को
उस इंजहार-ऐ-एहसास को क्या नाम दूँ

ना इश्क है, ना आशकी का जुनूँ
जाने क्या कहते है इसे, बेक़रारी या सुकूँ
सोचा है अब से इसको कशिश कहूँगी
इस सिलसिला-ऐ-चाहत और क्या नाम दूँ

वक़्त गुज़रा भी बड़ी तेज़ और ठहर भी गया
हाथो को मेरे छुआ भी उसने और सहम भी गया
मैं मुस्कुराती रही और वो मुझे देखता रहा घंटो
ना कहूँ इसको मोहबत तो और क्या नाम दूँ

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8 thoughts on “और क्या नाम दूँ

  1. bahut achhi nazm hein,
    ye do lines to dil ko chhu gyi….
    “वो कहता कुछ भी नहीं
    और सब कह भी जाता है”
    वक़्त गुज़रा भी बड़ी तेज़ और ठहर भी गया…

    • आमंत्रण के लिए धन्यवाद्
      ये मेरा सोभाग्य है के आप मुझे आमंत्रित कर रहे है
      मुझे ‘हिंदी चिट्ठा संकलक’ पर अपने ब्लॉग को सम्लित कर के बहुत प्रसन्नता होगी

  2. “ना इश्क है, ना आशकी का जुनूँ
    जाने क्या कहते है इसे, बेक़रारी या सुकूँ
    सोचा है अब से इसको कशिश कहूँगी”
    these lines are really heart touching…..

    simply SUPERB

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