हुकूमत

हर तरफ जो अनहद फैली है, वो नज़ाक़त किस की है ।
हिन्दू की है या मुस्लिम की, ये फ़क़ीर की मोहब्बत किस की है ।

हम तो अक्सर रहते है, इजतिराब से भरे बद-हवास से
आज तुम भी सहमे से हो, ये हिमाक़त किस की है ।

ऐसे तोर तरीके, तो पहले कभी तुम में दिखाई ना दिए
ये अदा कहा से आई, ये लयाक़त किस की है ।

गुज़रे वक़्त के साथ तुम्हारी निगाहों की पसंद भी बदली होगी
आजकल कोन रहता है दिल में, इन दिनों ख़्वाबों पे हुकूमत  किस की है ।

ना हमने खुदा को सजदा किया, ना  हाथ दुआ उठे मेरे
फिर कैसे हुआ दीदार तेरा, आखिर ये रहमत किस की है ।

बरसो गुज़रे हमे जुदा हुए, ये कैसी आज मायूसी है
तेरी नही तो फिर ये है किस की, ये एहसास-ए-शब-ए-फुरक़त किस की है ।

चल रहा है अब भी किस्सा कोई, हो रही है दिलो की सौदे अब भी
ना मैं हु ना तुम हो न कोई उम्मीद है, फिर ये तिजारत किस की है ।

करते हो मेरी कलम का ज़िक्र भी, मेरी ग़ज़लों को गुनगुनाते भी हो
फिर पूछते हो यूँ के ये दिलो पे ना-काबिल-ए-तस्खीर सियासत किस की है ।

नज़ाक़त : softness

अनहद : eternal

 इजतिराब : restlessness

लयाक़त : decency

एहसास-ए-शब-ए-फुरक़त : feeling of night of separation

तिजारत : business

ना-काबिल-ए-तस्खीर : unconquerable

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4 thoughts on “हुकूमत

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