गुलाबी कागज़

 

 

 

 

 

 

 

 

घर के आँगन में गहरा मातम पसरा था…एक तरफ ज़मीन पर  अनिल की माँ बेठी रो रही थी जो सन 1971 की लड़ाई में अपने पति को खो चुकी थी  …दूसरी तरफ कुछ बुजुर्ग बैठे थे….सामने के कमरे में पीले गुलाबी रंग की चूड़िया चारो  और टूट कर बिखरी हुई थी…उनके पास ही अमृता बैठी थी ….सुने हाथ …बेरंग चेहरा…बिखरे बाल…वो किसी पुराने पेड़ की तरह उजड़ी हुई लग रही थी..आज सुबह डाकिया २ चिठिया दे गया था जो उसके हाथो में थी….एक हाथ में एक  गुलाबी कागज़ पकड़ा हुआ था जिस पे लिखा था 

मेरी माँ से केहना ..

मैं आऊंगा अब के दीवाली पे ..

लड्डू बना के रखना …

और मेरी पसंद का गाजर का हलवा भी…

और मथुरा के पेडे मंगवा के रखना …

कहना के आते हुए उनके लिए बनारसी साड़ी लाऊंगा….

दीवाली पे पहनना…

छोटी के लिए झुमके लाऊंगा …

उस पे खूब जचेगा ये गेहना…

फैजाबादी चूड़िया भी लाऊंगा …

तुम्हारी बहु के लिए

वही  पीली  गुलाबी..

जो रोटी बेलते वक़्त उसके हाथो में खनकती है..

कुछ पैसे भेज रहा हु

घर को सजा के रखना …

मुझे फीका पड़ा हुआ रंग अच्छा नहीं लगता…

रंग रोगन करा के रखना

मैं आऊंगा अब के दीवाली पे ..

~~~~~~

और दुसरे हाथ में एक सरकारी चिठ्ठी जिस पे लिखा था 

Mrs. Amrita Sherawat

we are sorry to inform you that your husband Lieutenant Anil Sherawat is martyred” 

ये मायूसी …ये मातम सिर्फ  आँगन में ही नही उसके जीवन में भी फ़ैल गया था!!!

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18 thoughts on “गुलाबी कागज़

  1. बहुत सुदंर लिखा है सवाती दिल को छू गया ईरशाद………..

  2. ah so painful….it is after a long time that i read proper story in old hindi….u reminded me of my bygone years…accha laga….puraani yaadein 🙂

    PS- Very well written…..

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