मेरे वजूद का इक हिस्सा…!!

वो पल जो तेरी याद में बोये मैंने …
वो अब नन्हे पोधे से बढ़ कर पेड़ बन गए है
उनकी छाओं में अब दिन रात रहती हूँ
हस्ती हूँ , रोटी हूँ , तुम्हे महसूस करती हूँ
पर ना जाने क्यूँ सुन नही पाती
खामोशियाँ तुम्हारी मुसलसल मेरे दिल को चीर जाती है
वो पल जो अब वक़्त की गहरायी में दफ़न है

मेरे वजूद का इक हिस्सा है …

वो तेरे दिए हुए गुलाब जो किताबों में छुपाये मैंने ….
वो अब किसी उजड़े हुए इश्क की पुरानी विरासत लगते है
उन्हें छूती हूँ , देखती हूँ , फुर्सत में उन पर शायरी लिखती हूँ
पर ना जाने क्यूँ उनकी खुशबू ले नहीं पाती
उसकी मुरझाई पत्तियों में मुझे इक दर्द दीखता है
वो सूखे गुलाब जो कितोबो में दम तोड़ चुके है

मेरे वजूद का इक हिस्सा है …

वो कागज़ का टुकड़ा जो सीने से लगा कर रखा मैंने …
जिस पे तुमने युहीं लिख दिया था
“मैं सिर्फ तुम्हारा हूँ ”
अब भी तुम्हारे लौट आने की गवाही देता है
उसे पढ़ती हूँ , मानती हूँ , दोहराती हूँ …
ना जाने क्यूँ मान नहीं पाती के वो बस गुज़रा वक़्त है
जो कभी लौट के ना आ सकेगा
उसके लफ्जों में मुझे इक नाकामी सी दिखती है
वो कागज़ के टूकड़े जो पड़ते पड़ते फट गए

मेरे वजूद का इक हिस्सा है …

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8 thoughts on “मेरे वजूद का इक हिस्सा…!!

  1. Very touching poem…i have written about guy’s feelings in a relationship a lot of time….its great to read a girl’s side to it…very nicely worded poem…why don’t u try using google transliterate to publish a Hindi poem in Devnagri! Try it out 🙂

  2. सवाती आपने हमारा दिल छू लिया बहूत सूंदर लिखा……..xxxxx

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