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चंद बुँदे

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किसी ने पुछा, “कहाँ”?
हमने कहा –

किसी के दिल में, किसी के ख्यालों में रहते हैं!
हम रात के मुसाफिर हैं, कब उजालों में रहते है !!

किसी की दुआ में बनाते हैं घर हर अरदास के बाद !
हर शाम किसी के शबनमी प्यालों में रहते हैं !!

वो जो करता है याद हमें कर सांस के साथ, कभी सुनना उसको !
उसके जवाबों में रहते है, उसके सवालों में रहते हैं !!

पूछ कर देख दरिया से गहरी तेरी इन आँखों से
हम आज भी तेरे हुस्न के जमालों में रहते हैं !!

गिरी चंद बुँदे बारिश की मेरी हथेली पर तो एहसास हुआ की
मालुम होता है बादल भी तेरे दश्त-ए-ख्यालों में रहते हैं

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